National Shooting Championship Safety System
स्पोर्ट्स डेस्क। National Shooting Championship Safety System : कल्पना कीजिए, एक ही जगह पर हजारों बंदूकें हों और करीब 19,500 शूटर एक साथ निशाना लगा रहे हों। ज़रा सी चूक और बड़ा हादसा हो सकता है, लेकिन मजाल है कि किसी बंदूक की बैरल टारगेट के बजाय एक इंच भी इधर-उधर घूम जाए। हाल ही में संपन्न हुई 68वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप ने न केवल प्रतिभा का प्रदर्शन किया, बल्कि दुनिया को भारत के ‘सेफ्टी और अनुशासन’ का लोहा भी मनवाया। सवा लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड निशानेबाजों वाले इस देश में आखिर यह सिस्टम चलता कैसे है?
रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी: दुनिया की नई ‘शूटिंग पावर’ है भारत
इस बार की नेशनल चैंपियनशिप ने सफलता के सारे पैमाने बदल दिए। राइफल, पिस्टल और शॉटगन इवेंट्स में देशभर से रिकॉर्ड 19,500 निशानेबाजों ने हिस्सा लिया। राइफल के मुकाबले भोपाल में हुए, तो वहीं दिल्ली की डॉ. कर्णी सिंह रेंज पिस्टल और शॉटगन की गूंज से भरी रही। नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के महासचिव पवन सिंह के मुताबिक, “19,500 शूटर्स का शामिल होना अपने आप में एक वर्ल्ड रिकॉर्ड जैसा है।” आज भारत में रजिस्टर्ड शूटर्स की संख्या सवा लाख पार कर चुकी है, जो वैश्विक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि है।
हजारों बंदूकें, फिर भी खतरा जीरो: क्या है सेफ्टी का गुप्त मंत्र?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जहां इतनी बंदूकों और गोलियों का खेल हो, वहां हादसे क्यों नहीं होते? पवन सिंह बताते हैं कि इसका राज ‘ट्रेनिंग और अनुशासन’ में छिपा है।
सख्त प्रोटोकॉल: रेंज ऑफिसर की कमांड के बिना कोई शूटर अपनी गन का बॉक्स तक नहीं खोल सकता।
जीरो टॉलरेंस: ट्रिगर पर उंगली रखने से लेकर फायर करने तक, हर मूवमेंट इंटरनेशनल ज्यूरी और कोचेज की निगरानी में होती है।
लाइसेंस ऑफ सेफ्टी: जैसे गाड़ी चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस जरूरी है, वैसे ही यहां सेफ्टी नियमों को रटे बिना बंदूक पकड़ने की अनुमति नहीं मिलती।
डिजिटल हुआ ‘निशानेबाजी’ का मैदान
सवा लाख शूटर्स को मैनेज करना किसी चुनौती से कम नहीं है, लेकिन भारतीय शूटिंग फेडरेशन अब पूरी तरह टेक्नोलॉजी बेस्ड हो चुकी है। खिलाड़ियों को दफ्तर के चक्कर नहीं काटने पड़ते। रजिस्ट्रेशन, एंट्री फीस, स्कोर मैनेजमेंट और डेटा ट्रैकिंग—सब कुछ ऑनलाइन सॉफ्टवेयर के जरिए होता है। यह तकनीक न केवल पारदर्शिता लाती है, बल्कि जमीनी स्तर से नए टैलेंट को खोजने (टैलेंट हंट) में भी मदद करती है।
ओलिंपिक का सपना: उम्मीदें और हकीकत
भले ही वर्ल्ड कप और एशियन गेम्स में भारतीय निशानेबाज मेडल की झड़ी लगा देते हों, लेकिन ओलिंपिक में देश की उम्मीदें अक्सर अधूरी रह जाती थीं। हालांकि, पेरिस ओलिंपिक 2024 ने इस धारणा को बदला है। मनु भाकर, सरबजोत सिंह और स्वप्निल कुसाले के पदकों ने साबित किया कि अब भारतीय शूटिंग सिर्फ ‘एलीट’ खेल नहीं रहा, बल्कि यह ‘मेनस्ट्रीम’ बन चुका है। फेडरेशन अब खिलाड़ियों की मानसिक मजबूती (Psychological Support) और लॉन्ग-टर्म प्लानिंग पर फोकस कर रही है।
गौरवशाली इतिहास से सुनहरे भविष्य की ओर
2004 में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के सिल्वर से शुरू हुआ यह सफर, 2008 में अभिनव बिंद्रा के गोल्ड और अब पेरिस के ब्रॉन्ज पदकों तक पहुंच चुका है। जब सिस्टम इतना सुरक्षित हो और अनुशासन इतना कड़ा, तो बंदूकों से डरने की जरूरत नहीं है। जरूरत है उस माइंडसेट को बदलने की, जो अनुशासन के बाहर जाकर हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय शूटिंग रेंज आज दुनिया के लिए ‘मैनेजमेंट और सेफ्टी’ की सबसे बड़ी पाठशाला बन गई है।