Romeo and Juliet Clause : नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) में एक ऐतिहासिक बदलाव की जरूरत बताई है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि कानून में ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज को शामिल करने पर विचार किया जाए। इस निर्देश के पीछे मुख्य उद्देश्य किशोरों (Teenagers) के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों और यौन अपराधों के बीच के अंतर को समझना है, ताकि कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।
Romeo and Juliet Clause: क्या है ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज?
‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज का मतलब उन कानूनी प्रावधानों से है, जो तब लागू होते हैं जब दो किशोर (दोनों ही नाबालिग हों या उम्र में बहुत कम अंतर हो) आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं।
उद्देश्य: यह क्लॉज उन मामलों में राहत देता है जहां कोई ‘अपराधिक इरादा’ या ‘शोषण’ नहीं होता, बल्कि दोनों पक्ष अपनी मर्जी से साथ होते हैं।
फिलहाल स्थिति: वर्तमान पॉक्सो एक्ट में 18 साल से कम उम्र के साथ शारीरिक संबंध बनाना ‘रेप’ की श्रेणी में आता है, चाहे वह आपसी सहमति से ही क्यों न हो। इससे कई बार ऐसे किशोर भी जेल चले जाते हैं जो किसी का शोषण नहीं कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट को इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई?
सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन व्यवहार में इसका उपयोग किशोरों के आपसी प्रेम संबंधों को दंडित करने के लिए किया जा रहा है।
दुरुपयोग पर लगाम: अक्सर माता-पिता अपनी मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह या रिश्ते को खत्म करने के लिए पॉक्सो एक्ट का सहारा लेते हैं।
गंभीर अपराधियों और किशोरों में अंतर: कोर्ट का कहना है कि एक खूंखार यौन अपराधी और एक नादान किशोर (जो प्यार में है) को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता।
भविष्य की रक्षा: किशोर अवस्था में एक गलती या आपसी सहमति के कारण अपराधी का ठप्पा लगने से कई युवाओं का भविष्य और करियर बर्बाद हो जाता है।
समाज को क्या होगा लाभ?
यदि ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज कानून का हिस्सा बनता है, तो अदालतों के पास यह अधिकार होगा कि वे मामले की संवेदनशीलता और उम्र के अंतर को देखते हुए सजा में ढील दे सकें या मामले को खारिज कर सकें। इससे जेलों में भीड़ कम होगी और असली अपराधियों पर ध्यान केंद्रित करना आसान होगा। यह बदलाव किशोर न्याय (Juvenile Justice) के सिद्धांतों को अधिक मानवीय और तार्किक बनाएगा।